उत्तराखंड की विषम भौगोलिक संरचना और पहाड़ी इलाकों में हो रहे अनियंत्रित विकास कार्य हर साल मानसून के दौरान राज्य को प्राकृतिक आपदा का केंद्र बना देते हैं। विशेष रूप से भूस्खलन की घटनाएं अब गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं।
10 सालों में 4662 भूस्खलन, 319 मौतें
वर्ष 2015 से 2025 तक उत्तराखंड में कुल 4662 स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं हो चुकी हैं। इन हादसों में अब तक 319 लोगों की जान जा चुकी है और 192 लोग घायल हुए हैं। इसके अलावा लाखों की संपत्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा है।
67 सक्रिय और अतिसंवेदनशील भूस्खलन क्षेत्र
वर्तमान में उत्तराखंड में 67 अतिसंवेदनशील क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं। वर्ष 2025 में ही 5 नए खतरे वाले स्थान सामने आए हैं। ये क्षेत्र न केवल यातायात और आवागमन में बाधा बनते हैं, बल्कि जान-माल की हानि की भी बड़ी वजह बनते हैं।
विकास कार्य भी बना कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क निर्माण, कटिंग, और अनियोजित निर्माण कार्यों की वजह से नए भूस्खलन क्षेत्र उभर रहे हैं। जहां विकास हो रहा है, वहां जमीन की स्थिरता कम हो रही है। हालांकि, यह समस्या केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य पर्वतीय राज्यों जैसे हिमाचल, सिक्किम और अरुणाचल में भी देखने को मिल रही है।
सटीक कारणों की पहचान न हो पाने की वजह से इनका स्थायी समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है। हर मानसून में ये क्षेत्र दोबारा सक्रिय हो जाते हैं और हर बार नए खतरे सामने आते हैं।
केंद्र सरकार की पहल
हाल ही में केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के 5 अति संवेदनशील भूस्खलन क्षेत्रों को स्थायी रूप से दुरुस्त करने के लिए ₹125 करोड़ की सहायता राशि स्वीकृत की है। इसके साथ ही राज्य सरकार ने 32 भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों के लिए विस्तृत कार्ययोजना भेजी है और केंद्र से और सहायता की मांग की है।
क्या है आगे की राह?
- विज्ञान आधारित भूस्खलन मैपिंग
- स्थायी रिटेनिंग वॉल्स और ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण
- जन-जागरूकता अभियान
- भूस्खलन पूर्व चेतावनी प्रणाली का विकास