कनखल: सती की मायानगरी और शिव का वचनबद्ध आगमन

हरिद्वार की पुण्य धरा में स्थित कनखल, न केवल पौराणिक इतिहास का साक्षी है बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा को जीवित रखने वाला केंद्र भी है। यह वही भूमि है जहां राजा दक्ष ने विराट यज्ञ का आयोजन किया था, और भगवती सती ने अपमान की अग्नि में अपने प्राणों की आहुति दी थी। यह घटना केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के सनातन संयोग का आधार बन गई।

कनखल
कनखल

सती की जन्मभूमि और शिव की ससुराल

कनखल के शीतला मंदिर में भगवती सती का जन्म हुआ था। यहीं से प्रारंभ होती है वह कथा जिसमें सती, शिव से विवाह करती हैं, लेकिन उनके पिता दक्ष इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करते। जब यज्ञ में शिव का आमंत्रण नहीं भेजा गया और सती ने स्वयं को अग्नि को समर्पित किया, तब शिव कुपित हुए और उन्होंने तांडव किया।

वीरभद्र ने यज्ञ को ध्वस्त किया और सती की दग्ध देह को शिव ने अपने कंधे पर उठाया। इसी देह के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्ति पीठों की स्थापना हुई — कुल 52 शक्ति पीठ

दस ज्योति केंद्र: शिव और शक्ति के जाग्रत स्थल

कनखल और इसके आसपास के क्षेत्र में शिव और शक्ति के पांच–पांच ज्योति स्थलों की परंपरा है:

शक्ति के पांच ज्योतिर्थल:

  • शीतला मंदिर
  • सतीकुंड
  • मायादेवी मंदिर (आदि शक्ति पीठ)
  • चंडी देवी
  • मनसा देवी

इनका केंद्र पाताल में स्थित माना गया है — मायादेवी मंदिर का गर्भगृह ही आदि पीठ है।

शिव के पांच ज्योतिर्थल:

  • दक्षेश्वर महादेव
  • बिल्वकेश्वर
  • नीलेश्वर
  • वीरभद्र
  • नीलकंठ महादेव

इनका केंद्र आकाश में माना गया है — अर्थात दिव्यता और चेतना का शिखर।

श्रावण मास: जब शिव आते हैं वचन निभाने

स्कंद पुराण के अनुसार, श्रावण मास में कनखल और इसके आसपास का क्षेत्र शिव, शक्ति और मां गंगा की कृपा से जाग्रत हो जाता है। यह वही महीना है जब भगवान शिव, दक्ष को दिए वचन को निभाने, दक्षेश्वर रूप में कनखल में विराजते हैं।

कांवड़ यात्रा में आए शिवभक्त जब कनखल में दर्शन करते हैं, तो उन्हें इन सभी स्थलों की कृपा प्राप्त होती है। यह केवल यात्रा नहीं, एक आध्यात्मिक जागरण है, जो देवताओं के चरणों से पवित्र हुई भूमि में शिव के साक्षात दर्शन कराता है।

कांवड़ यात्रा और गंगाजल अर्पण की परंपरा

हरिद्वार से निकलने वाली श्रावणी कांवड़ यात्रा को देश की सबसे बड़ी यात्रा माना जाता है। लाखों श्रद्धालु गंगाजल लेकर अपने क्षेत्रीय शिवालयों तक जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब शिव के दसों ज्योति केंद्रों से कृपा मिलती है, तभी यह यात्रा सफल और सुरक्षित पूर्ण होती है।

 

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