उत्तराखंड पंचायत चुनाव: भाजपा और कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर

उत्तराखंड में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 2024 भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों के लिए गंभीर राजनीतिक परीक्षा बनकर उभरे हैं। प्रदेश के 12 जिलों में दो चरणों में संपन्न हुए चुनावों के परिणाम 31 जुलाई को घोषित होंगे, जिससे स्पष्ट होगा कि राज्य की ग्रामीण राजनीति में किस दल का प्रभाव मजबूत है और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कौन जनता का विश्वास जीत रहा है।

उत्तराखंड पंचायत चुनाव
उत्तराखंड पंचायत चुनाव

भाजपा की नगर निकाय जैसी रणनीति

भाजपा ने इस बार पंचायत चुनाव में नगर निकाय चुनाव जैसी रणनीति अपनाई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद दोनों मंडलों (गढ़वाल और कुमाऊं) में सक्रिय नजर आए और अपने कैबिनेट सहयोगियों व संगठन के साथ मिलकर चुनाव प्रबंधन में जुटे रहे।

वहीं कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, हरीश रावत, प्रीतम सिंह, और गणेश गोदियाल जैसे अनुभवी नेताओं पर भरोसा जताया। पार्टी ने समर्थित प्रत्याशियों के चयन और उन्हें जिताने की जिम्मेदारी अपने क्षत्रप नेताओं और विधायकों को सौंपी।

समर्थन की लड़ाई, परोक्ष दांव

गौरतलब है कि पंचायत चुनाव में राजनीतिक दल सीधे चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन समर्थित प्रत्याशियों के माध्यम से अपनी पकड़ दिखाने की पूरी कोशिश करते हैं। इस बार भी भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने कैडर और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारा।

44 बनाम 15 विधायकों की परीक्षा

इन चुनावों में भाजपा के पास 44 विधायक हैं जबकि कांग्रेस के 15। दोनों दलों ने अपने विधायकों की ताकत का परीक्षण समर्थित प्रत्याशियों के जरिये किया है। चुनाव के नतीजे यह भी बताएंगे कि किस पार्टी का नेटवर्क और जनसंपर्क मजबूत है और कौन ग्रामीण मतदाताओं के दिल में जगह बना पाया है।

जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख की जंग आगे

फिलहाल चुनाव जिला पंचायत सदस्यों और क्षेत्र पंचायत सदस्यों के लिए हुए हैं। आगे चलकर इन्हीं निर्वाचित सदस्यों के जरिए जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख चुने जाएंगे। यही वजह है कि इन चुनावों को ‘छोटी सरकार’ की नींव माना जा रहा है और सभी दल इसे बहुत गंभीरता से ले रहे हैं।

2027 की ओर पहला कदम

इन पंचायत चुनावों को आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों की नींव के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा ने जहां पूरी संगठनात्मक ताकत झोंकी है, वहीं कांग्रेस इसे गांव-गांव में वापसी का मौका मान रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह चुनाव यह संकेत देगा कि ग्रामीण मतदाता किसके साथ हैं और कौन सी पार्टी उन्हें बेहतर ढंग से साध रही है।

 

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