उत्तराखंड परिवहन निगम यात्रियों की सुरक्षा से खुला खिलवाड़ कर रहा है। जहां एक ओर वाहन सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार सही और मजबूत टायर होते हैं, वहीं दूसरी ओर निगम की सैकड़ों बसें घिसे, फटे और रबर चढ़े टायरों के सहारे दौड़ रही हैं — वो भी लंबी दूरी और पर्वतीय मार्गों पर।

दिल्ली से दून आ रही बस हादसे से बाल-बाल बची
- सोमवार तड़के रुड़की डिपो की एक बस (UK07-PA-4505) दिल्ली से देहरादून आते समय छुटमलपुर में अगला टायर फटने से बड़ी दुर्घटना का शिकार होते-होते बची।
- बस में 30 यात्री सवार थे। टायर फटते ही बस अनियंत्रित हो गई और यात्रियों में चीख-पुकार मच गई।
- चालक शिवम कुमार और परिचालक राजकुमार छोकर की सतर्कता से बस को नियंत्रित किया गया।
चालक की चेतावनियां नजरअंदाज
- चालक पिछले 15 दिनों से लगातार पंजिका में टायर बदलने की शिकायत दर्ज करा रहा था।
- इसके बावजूद कार्यशाला ने कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे यह हादसा होते-होते टला।
रबर चढ़े टायर: नियमों की खुली अवहेलना
- परिवहन निगम की नियमावली में स्पष्ट है कि रबर चढ़े (रिट्रेड) टायर प्रतिबंधित हैं।
- बावजूद इसके, देहरादून और काठगोदाम डिपो में रबर चढ़ाने की प्रथा खुलेआम चल रही है।
- एक टायर को दो से तीन बार रिट्रेड किया जा रहा है, जिससे टायर फटने की संभावना 90% तक बढ़ जाती है।
900 बसें, सिर्फ 500 टायर खरीदे गए
- बीते 5 वर्षों में उत्तराखंड की 900 बसों के लिए केवल 500 टायर खरीदे गए।
- इनमें से अधिकतर टायर सिर्फ आगे के दो पहियों के लिए थे।
- पीछे के चार टायरों पर तो रबर चढ़ाकर काम चलाया जा रहा है।
दुर्घटनाओं का बढ़ता ग्राफ
- रविवार को हरिद्वार से खाटूश्यामजी जा रही बस मेरठ के वलीदपुर दौराला में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, जिसमें चालक-परिचालक समेत दर्जनभर यात्री घायल हो गए।
- यह घटना भी अगला टायर निकलने से हुई थी।
चारधाम यात्रा से पहले हुआ था प्रतिबंध
- इस वर्ष चारधाम यात्रा से पहले हुई आधिकारिक बैठक में रबर चढ़े टायरों पर रोक लगाई गई थी।
- परिवहन निगम के अधिकारी इस बैठक में मौजूद थे, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई अमल नहीं हुआ।